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किसी भी क्षेत्र में सफलता की UPSC Syllabus pdf in Hindi ऊंचाइयों पर कोई एक दो दिन की बात नहीं होती इसके लिए जब बच्चे को जन्म होता है l

तब से लेकर सफलता की ऊंची मंजिल तक पहुंचने तक की अवधि तक की अवधि में बहुत कुछ बातों की आवश्यकता होती है l इन्हें हम निम्नलिखित, क्रम निरूपित कर सकते हैं,

नवाजतिशीषु प्रदत्त संस्कार युवामन स्वप्नदर्शन अर्जित संस्कार लक्ष्यानिध्रण, इच्छा शक्ति आत्मा विश्व लगन सकारात्मक विचार अथकपारी श्रम तकनीकी मंजिल आदि l

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मंजिल इन समस्त तत्वों और UPSC Syllabus pdf in Hindi गुणों का योग होता है l बच्चे के मां के गर्भ में आने से लेकर उसके बढ़ने और पैरों पर

खड़े होने तक माता पिता परिवार पास पड़ोस परिवेश मित्र अध्यापक आदि से संस्कार प्राप्त होते हैं l इन संस्कारों के लिए व्यक्ति को कोई परिश्रम नहीं

चेष्टाओं से बहुत सारी बातें सीखता है, जो अनवरत चलता रहता है l सीखने है, जो अनवरत चलता रहता है l सीखने की इस प्रक्रिया से व्यक्ति को जो

ज्ञान, जीवन कौशल प्राप्त होता है, उसे अर्जित संस्कार कहते हैं l कहना चहिए ये संस्कार यक्ति के द्वारा स्वयं ही अर्जित किए जाते हैं ,https://janavicomputercourse.com/2024/06/%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%8f%e0%a4%b8%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a5%81%e0%a4%b2-%e0%a4%ab%e0%a5%89%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8/

इसके साथ ही यदि व्यक्ति के प्रदत्त संस्कारों में कुछ कमी होती है, तो इस कमी को अर्जित संस्कारों द्वारा पूरा किया जा सकता है l

अंत उन लोगों के लिए भी आशा की की सुनहरी किरण हैं, जिन्हें बचपन में अच्छे प्रदत्त संस्कार नहि मिल पाए है, इसी तरह से यदि व्यक्ति में प्रदत्त

संस्कारों के विपुल भंडार भरे पड़े हुए हैं, तो व्यक्ति को अर्जित संस्कारों के लिए ज्यादा मेहनत करने की आवश्यकता नहीं होती कुल मिला कर दिनों

के योग परिणाम ही व्यक्तित्व निर्माण है l इसके साथ साथ आवश्यकता है, कि व्यक्ति कुछ कर दिखाने का सपना देखता हो यद्यपि व्यक्ति तरह तरह

के सपने देखता है l वह प्राप्त होने वाली अनेकानेक उपलब्धिद्यों को देख कर देख कर उनकी ओर आकर्षित होता, ओर स्वयं भी उन

उपलब्धियों को प्राप्त करने की बात सोचता है, सपने देखते समय अनेक बातें व्यक्ति के मन में होती है, उस समय उसके मन में एक उहापोह की

स्थिति बन जाती है l परन्तु धीरे धीरे अपनी परिस्थितियों वा साधन संसाधनों को देख कर व्यक्ति उन सपनों में से कुछ मुख्य सपनों चाहती का चयन कर

लेता है l इस समय बिखरे हुए सपनों में से कुछ प्रमुख सपने केंद्रित होने लगते हैं l अंत अब आवश्यकता आ पड़ती है उन मुख्य सपनों में से किसी

एक के चयन की क्योंकि व्यक्ति के लिए सारे सपने एक साथ ना ही पूरे किए जा सकते हैं, ना ही पूरे हो सकते हैं l चयन की इस प्रक्रिया को लक्षय

निधर्रणा कहा जाता है l यधिप लक्ष्य का चुनाव भी आसान काम नहीं होता व्यक्ति को चहिए कि वह इन असीमित सपनों में से अपने पास उपलब्ध

संसाधनों और परिवेश को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण सपने को साकार करने के लिए अपना लक्ष्य चुन ले l

लक्ष्य निधार्रण के बाद बात आती है इच्छा शक्ति को करने की यद्यपि ये सभी प्रक्रियाएं साथ साथ चलती है,UPSC Syllabus pdf

इच्छा शक्ति का तात्पर्य है कि आपने जो लक्ष्य बनाय है, उसे प्राप्त करने के लिए आपमें कितनी बलवती इच्छा है l जितनी ही बलवती इच्छा आपमें

होगी लक्ष्य उतना ही जल्दी आपको प्राप्त होगा अंत लक्ष्य पाने के लिए अपने अंदर तीव्र इच्छा शक्ति विकसित करने की आवश्यकता होती है l

इसके बाद जरूरत होती है निर्धारित लक्ष्य पर आपनी शारीरिक वा मानसिक शक्तियों को केंद्रित करके लक्ष्य पर कार्य करने की अर्थात लगना की तात्पर्य

यह कि आपसे किसी उपलब्धि को प्राप्त करने के लिए कितना तीव्र लगवा है, अर्थात कार्य करते समय आपमें कितनी तामन्यता बनी रहती है l

आप अपने कार्य को कितना डूब कर करते हैं l जब व्यक्ति किसी कार्य को तान्यमयता के साथ करता है तो किया हुआ मेहनत सार्थकता प्रदान करने वाला होता है l

लक्ष्य के लिए अगला तत्व है सकारात्मक विचार सकारात्मक विचार भी लक्ष्य प्राप्ति के लिए एक आवश्यक तत्व है l आपने देखा होगा कि मनोरंजन

के साथ किया हुआ कार्य शीघ्रता से पूर्ण होता है, और स्थायित्व प्राप्त कर लेता है l जब आप मनोरंजन के साथ कोई कार्य सीखते हैं तो उसे जल्दी

सीख जाते हैं l जब कि उबाऊ और बेझिल प्रकृति के कार्य को करना और सीखना दोनों ही मुशिकल होता है l

आई . ए. एस. आफिसर या सम्मानित अधिकारी

कोई भी कार्य अपने आपमें उबाऊ या दिलचस्प नहीं होता बल्कि यह व्यक्ति के सोचने के नजरिए से भी उबाऊ या दिलचस्प बन जाता है l

एक ही कार्य भिन्न भिन्न व्यक्तियों को रोचक या उबाऊ लग सकता है l

जब हम अपने कार्य के प्रति या उस समय घटने वाली घटनाओं वा आने वाली समस्याओं के प्रति ऐसी नजरिया रखते हैं कि जो भी हो रहा है वह

किसी न किसी तरह अपने हित में ही है l हम किसी कष्टदायक बात को भी किसी न किसी प्रकार से अपने हित में ले लेते हैं l

ऐसे विचारों को सकारात्मक विचार कहते हैं l जब हमारे मन में ऐसी सोच होती है तो हम अपने कार्य को बड़े उत्साह के साथ करते हैं,

लक्ष्य प्राप्ति का अगला आवाश्यक तत्व है परिश्रम और UPSC Syllabus pdf in English तकनीकी कोई भी उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण कार्य

कठिन परिश्रम के बिना सफल नहीं हो सकता हो सकता इसके साथ ही तकनीकी के द्वारा निधारित कार्य को करने में परिश्रम कम और उपलब्धि ज्यादा प्राप्त होती है l

इतने सारे आयामों से गुजरने के बाद बारी आती है लक्ष्य की लक्ष्य अपने आप में एक बहुत मनभावन और मीठा अहसास देने वाला शब्द होता है l

लक्ष्य प्राप्त हो जाने पर व्यक्ति को सुख और आत्मसंतोष प्रप्ता होता है l आगे हम सफलता प्रप्ति के इन प्रत्येक आवाश्यक तत्वों का विस्तार से वर्णन करेंगे l

स्वप्न दर्शन और लक्ष्य

कया होता अगर लोगों के मन में जज्बातें न होती उनके मन में विविध प्रकार की तमन्नाएं न होती क्या उस स्थपति में यह दुनिया एक कदम भी आगे बढ़

पाती नहीं ज्यों की त्यों थम जाती यह अपने स्थान पर आज दुनिया के विकास को हम अपनी आंखों से देख रहे हैं l

कितना कितना विकास हो गया है, और होता ही जा रही कल लोग रोडियो और टीवी को आश्चर्य मानते थे l लोग मान ही नहीं सकते थे कि एक जगह

बोली जाने वाली आवाज को कही दूसरी जगह भी भेजा जा सकता है, या सुना जा सकता है l एक जगह घटाने वाली घटना या क्रियाक्लापो को उसी

समय पर कहीं दूसरी भी देखा जा सकता है l चांद की कहानी घर घर की सदियों अपने पोते पोतियों को सुनाती थी, कि चांद में एक बुढिया बैठी हुई

सूत कांत रही है l आज उसी चांद पर यात्राओं के लिए उड़ाने होने लगी ग्रह उपग्रह पर यानों को पहुंचा देना और उसके अंदर बाहर की खोज कर

डालना एक आम बात हो गईं हैं l तात्पर्य यह कि जिन बातों को कुछ दिनों पहले पूर्णत असंभव माना जाता था, वह आज महज एक खेल बन गया है l

और इन सारे कार्यों के पीछे निश्चित रूप से मानव के सपने ही रहे हैं l मानव इन असंभव कार्यों को संभव करने का सपना न जाने कितनी कितनी बार

देखा होगा उसने सतत प्रयास किया होगा और एक दिन मानव के ये सपने सच होते चले गए होंगे l

हर व्यक्ति अपने जीवन में न जाने कितने कितने प्रकार के सपने देखता रहता है l काश मुझे यह मिल जाता मुझे वह मिल जाता तो कितना अच्छा होता l

काश मुझे अमुक नौकरी मिल जाती काश मैं अपने देश का प्रधानमंत्री बन जाता काश मुझको वह ब्यूटीफुल लड़की प्यार करने लगती या काश मेरी

शादी अमुक लड़के से हो जाती काश मैं पक्षियों के समान आकाश में उड़ पाता काश मैं चांद सितारों की दुनिया में विचरण कर पाता काश मैं मौत

की दवा बना पाता न जाने कितने कितने प्रकार के सपने मानव अपने हर लम्हों में देखता रहता है l और उसके जो सपने सावधिक प्रिय होते हैं,

उनके लिए वह दिलोजान से प्रयास भी करता है l जब प्रयास अच्छा होता है तो उसको वर्छित्त वस्तु मिल भी जाती है l अर्थात उसका सपना सच हो जाता है l

डॉक्टर अब्दुल कलाम जब छोटे बच्चे थे, तो उन्हें आकाश में उड़ने की बड़ी इच्छा होती l वे हमेशा सोचते रहते काश मैं बादलों के बीच उड़ान भर पाता

तो कितना अच्छा होता l अगर मेरे पंख उग आए तो मैं उड़ते हुए सबसे पहले अपनी नानी के घर पहुंच जाऊं मेरी नानी जब मुझे आकाश से उड़ कर अपने

घर के आंगन में उतर ते हुए देखेगी तो वह कितनी खुश होगी सभी लोग दांतो तले अंगुली दबा लेंगे मैं अपनी नानी से बोलूगा नानी देख ना मैं

आकाश में उड़ सकता हूं l जब मुझे अपने घर जाना होगा तो मैं तेरे आंगन से उडूगा और पल भर मैं अपने घर पहुंच जाऊंगा घर पहुंच कर मैं मां से बोलुगा

मां देख ना मैं नानी के घर घूम कर आ गया यह देख कर मेरी मां बहुत खुश होगी इस तरह के अनेकानेक सपने देखा था, अपनी बाल्यावस्था में हमारे

भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम ने और वही फिर एक दिन राकेट इंजीनियर और मिसाइलमैन बन गए अपने सपनों के बारे में वे बच्चों को

थे l वे कहते थे, बच्चो खूब सपने देखो सपने देखने से ही हमारे मन में कोई महान कार्य करने की इच्छा जागृत होती है l

सपनों से हमें लक्ष्य प्राप्त होते हैं, और हम प्रयास करके अपने लक्ष्य पर कार्य करते हुए एक दिन महान कार्य कर डालते हैं l

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कोलंबिया अंतरिक्ष यौन में अंतरिक्ष अन्वेषण दल का नेतृत्व करने वाली महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक कल्पना चावला भी बचपन में चांद सितारों की

दुनिया में उड़ान भरने का सपना देखा करती थीं l वह ग्रीष्मकालीन रात्रि में अपने आंगन में चारपाई पर पड़ी हुईं अनवरत चांद सितारों की ओर देखती

रहती उसे लगता कितना अच्छा होता यदि मैं इन चांद सितारों की दुनिया में जाकर उड़ान भरती आखिर कल्पना बड़ी होकर 1982/में पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से वैमानिकी इंजिनियरिंग की डिग्री 1984/में

टेक्सास विश्व विद्यालय से वैमानीकी इंजिनियरिंग में मास्टर डिग्री एवं 1988/में कोलेरेडो विश्व विद्यालय में वैमानीकि में डाक्टर की उपाधि

प्राप्त की फिर वह 1988/में नासा से जुड़ गई उसकी कर्मठता और विलक्षण प्रतिभा के कारण उसे जॉनसन अंतरिक्ष केन्द्र के 15/सस्यीय अंतरिक्ष अन्वेषण दल का नेतृत्व प्रदान किया गया l

वह 16/नवंबर 2003/को कोलंबिया अंतरिक्ष यान पर सवार होकर अंतरिक्क्ष उड़ान पर गई उन्होंने अंतरिक्ष में चांद सितारों के बीच भ्रमण

किया इस तरह उसकी जिंदगी में एक ऐसा दिन आ पहुंचा जब उसके सपने साकार हो गए हो गया l वह सचमुच में अंतरिक्ष शतलों के द्वारा अन्वेषण

दल का नेतृत्व करते हुए आसमान में चांद सितारों की दुनिया में उड़ान भरने लगी खेद का विषय है कि 1/फरवरी 2003/को कोलंबिया अंतरिक्षयान

की धरती पर वापसी की यात्रा कल्याण की अंतिम अन्तरिक्ष यात्रा बन गई इस दिन कोलंबिया अंतरिक्षयान अपनी वापसी के समय पृथ्वी के वायुमंडल

में प्रवेश करते ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई l इस तरह से हमारे मन में कई तरह की वस्तुएं संवधन प्रसाधन सफलता

न जाने कितनी वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा होती रहती है l इन्ही इच्छाओं को हम सपने देखना कहते हैं l कई बार हमारी प्रबल इच्छाएं

हमारे सपने में साकार रूप लेकर आती है l आप भी ऐसे सपने देखें होगें कभी कभी हम किसी व्यक्ति से मिलने की बड़ी प्रबल इच्छा रखते हैं,

पर वे हमें किन्ही कारणों वश नहीं मिल पाते फिर पाते फिर हम लोग उनसे सपनों में मिलते हैं l लोग सपनों में परीक्षाएं देते हैं l वे आकाश में उड़ने लगते

है l यह सब क्या है, यही है, सपने हमारी जिन वस्तुओं को प्राप्त करने की बलवती इच्छा हमारे अंतर्मन में होती है, उन्हीं को हम सपने में देखते हैं,

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या जरा सा उनका परिवर्तित रुप देखते हैं l कुल मिला कर सपने देखने से तात्पर्य हुआ व्यक्ति के अन्दर किसी वस्तु को प्राप्त करने की प्रबल चाहत

का होना अब बात यह भी होती है, कि लोगों के आई ए एस कैसे बनें की लोगों के सारे सपने पूरे नहीं होते क्योंकि लोगों की इच्छाएं तो अनन्त होती है, इसलिए सपने भी अनन्त होते हैं l

ध्यान देने की बात है कि अनन्त सपनों में से कुछ सपनों को अभीष्ट मान कर उसे अपने लक्ष्य में परिवर्तित करना होता है l फिर लक्ष्य पर परिश्रम वा तकनीकी के साथ कार्य करना होता है l

यदि हम लक्ष्य प्राप्ति के लिए तकनीकी पूर्ण परिश्रम करने में सक्षम होते हैं, तो लक्ष्य हमें प्राप्त हो जाता है l उल्लेखनीय है कि ना तो अनन्त इच्छाओं

को अपना लक्ष्य बनाया जा सकता ना ही उन पर कार्य किया जा सकता है l इसीलिए अनन्त सपने साकार भी नहीं हो पाते हां लोग अपने जीवन में एक

से एक से अधिक सपने को बारी बारी से अपना लक्ष्य बना कर उन्हें पूरा अवश्य कर डालते हैं l सपने देखने का महत्त्व इसी बात में है,

कि जब हम किसी वस्तु का सपना देखते हैं, तो उनसे हमें अपने लिए कई लक्ष्य प्राप्त हो जातें हैं l

लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए और भी कई बातों की आवश्यकता होती है, जिनका वर्णन हम अगले पृष्ठों पर करेंगे l

लक्ष्य निर्धारण

यह दुनिया रंग बिरंगी है l आपको बहुत सी बातें लुभा लेती है l हर आकर्षक वस्तु आपको प्रिय लगती है, और उन सभी को प्राप्त करना चाहते हैं l

यहीं पर कठिनाई आ जाती है l आपको उन रंग बिरंगी वस्तुओं में से एक का चयन करना होगा कहने का तात्पर्य यह कि एक साथ आप यह कभी न

सोचिए कि आप डॉक्टर इंजीनियर मैनेजर कर्नल पायलट एसपी क्लेकेटर, सी एम, मंत्री आदि सब कुछ बन जाएंगे या कहीं कुछ तो कहीं कुछ बनने

एक कहावत है कि आधी छोड़ सारी को धवै आधी रहै न सारी पवैं इन अनन्त इच्छाओं और अनन्त संभावनाओं की दुनिया में विचार बिखरते

अवश्य है, परन्तु कुछ ही दिनों में हमारे विचार अपने आप ही कुछ चीजों पर केंद्रित होने लगते हैं l प्राय बाल्यावस्था के बाद यह स्थिति आने लगती है,

फिर भी इस समय सिर्फ भी इस समय सिर्फ और सिर्फ एक ही विचार नहीं होते जिसका कारण मतिभ्रत की स्थिति का उत्पन्न होना है l

अपने मन में उभरे हुए कई सपनों के बीच व्यक्ति निश्चय नहीं कर पाता कि आखिर वह वर्तमान में किस पर कार्य प्रारंभ करदे इसके भी कई कारण होते हैं l

व्यक्ति हमेशा यही सोचता है कि मैं ऐसा कर पाऊंगा या नहीं क्योंकि साधन संसाधन वा परिवेश व्यक्ति को यह सोचने के लिए मजबूर करते रहते हैं l

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आपको भी अपना लक्ष्य चुनने के लिए यह देखना चहिए कि वर्छिता लक्ष्य आपको लिए कितना सार्थक होगा उसको पूरा करने के लिए आपको किस

हद तक परिवाशीय सुविधाएं प्राप्त हो पाएंगी संबंधित लक्ष्य के लिए कितने परिश्रम की आवश्यकता होगी क्या आप इसके लिए सक्षम है l

अन्य लोगों की इसके लिए कितनी मदद प्राप्त हो पाएंगी कहीं आप अपने लक्ष्य रूपी सागर के भंवरों में अकेले तो नहीं फस जायेंगे वर्छित लक्ष्य

की प्राप्ति के लिए सहायक सामग्री वा वस्तुएं किस हद तक आपको प्राप्त होने की संभावना है, इस तरह से उपरोक्त तत्वों का सहारा लेते हुए अनेक

विचारों तकों वा मनन मंथन के बाद अनेक सपनों में से किसी एक को लक्ष्य चुनना और उस पर कार्य करना बुद्धि मानी की बात मानी जाती है l

यदि हम पीछे ऊल्लेख किए गए नामों में से भारत की बेटी कल्पना चावला का उदाहरण लें तो हम पाते हैं कि बाल्यावस्था में ही उनकी सिर्फ अनन्त

आसमान में उन्मुक्त उड़ने की बड़ी तमन्ना थी l आप सोच सकते हैं, कि उनकी सिर्फ एक ही इच्छा न रही होगी क्योंकि स्वाभाविक रूप से मानव

मात्र में अनेक आवश्यकताएं और इच्छाएं जागती है l UPSC Syllabus pdf परन्तु अनेक इच्छाओं में से चांद सितारों के बीच उड़ने की उनकी

की उनकी इच्छा ज्यादा बलवती थी l अंत उन्होंने अपने इस लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए बहु आयामी सोच विचार किया जब उन्हें लगा कि मैं इस

लक्ष्य पर अच्छे से कार्य कर सकती हूं तो धीरे धीरे उनके सारे क्रियाकलाप उनकी अभीष्ट की ओर मुड़ने लगे फिर अंतरिक्ष इंजीनियर बनना उनका

लक्ष्य बन गया बुद्धि मानी पूर्ण लक्ष्य चयन के कारण ही उनका लक्ष्य सफ़लता के रुप में उन्हें प्राप्त हुआ और उनकी उन्मुक्त आसमान में उड़ना भरने की बलवती इच्छा एक दिन पूरी हुई l

आई ए एस कैसे बनें

व्यक्ति के वे सपने जिनमें इच्छा शक्ति आत्मा विश्व लगन जैसे चीजें शामिल हों, वे अवश्य ही पूरी होती है l

इस प्रकार जो सपने वा इच्छाएं व्यक्ति मनोमस्तिष्क, में उभरकर आती है, उन्ही में से लक्ष्य का चयन किया जाता है l

प्राय प्रतियोगी के द्वारा सिविल सेवा या किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षा के लिए लक्ष्य निर्धारण करने के पूर्व अच्छी तरह से विचार किया जाना चाहिए कि

आपकी आर्थिक स्थिति कैसी है, आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि कैसी है l आपका बौद्धिक या मानसिक स्तर कैसा है, यदि आपका लक्ष्य ऐसी

प्रतियोगी परीक्षाओं में ऊंची सफलता प्राप्त करना है, तो आपको संबंधित प्रतियोगिता के लिए अच्छी अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो पायेगी या नहीं

आपके लिए कोचिंग या मार्गदर्शन आदि की कितनी सुविधाएं हैं, क्या संबंधित प्रतियोगिता आपके द्वारा स्नातक या स्नातकोत्तर कक्षाओं में

अध्ययन किए गए विषयों से संबंधित है, या समय पर किसी अन्य व्यक्ति से आपको उस प्रतियोगिता के संबंध में गई ड्रेस मिल जायेगा या आपके लक्ष्य

के लिए आपकी पृष्ठभूमि साधन संसाधन किस हद तक सहयोगी हो सकता है, यदि विभिन्न बिंदुओं को दृष्टिगत रखते हुए खूब सोच विचार कर अपना

लक्ष्य निर्धारित करने से आपके लक्ष्य में सफलता के आसार बढ़ जायेंगे आप अपनी स्थितियों परिस्थितियों प्राप्त हो सकने वाले साधनों संसाधनों परिवेश

अपने माता पिता या रख सहयोगियों मन स्थिति और सामर्थ अपनी स्वय की पसंद आदि अनेकानेक बातों को ध्यान में रख कर अपना एक निश्चित लक्ष्य

बनाइए आप इस बात का भी विचार करले कि आप स्वयं उस लक्ष्य के प्रति किस हद तक कार्य कर पाएंगे क्योंकि दुनिया का प्रत्येक महान कार्य या

प्रत्येक महान लक्ष्य सफलता के लिए अपने ऊपर व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक शक्तियों के पूर्ण समर्पण और पूर्ण शक्ति के केंद्रीय कारण की अपेक्षा करता है l

कभी कभी किसी विशेष वस्तु या सेवा या उपलब्धि के लिए व्यक्ति में बड़ी तीव्र चाहता होती है l ऐसी स्थिति में व्यक्ति उस लक्ष्य को पाने के लिए

दुरूह से दुरूह कठिनाइयों को भी झेल जाने की हिम्मत कर लेता है l ऐसी स्थिति में वह अपेक्षित लक्ष्य को ऐन केन प्रकारेणा प्राप्त भी कर लेता है l

फिर भी लक्ष्य निर्धारित करते समय उपरोक्त सारी बातों पर बार बार सोचिए इसके बाद अपना लक्ष्य निश्चित किजिए आपके द्वारा निर्धारित किया गया

लक्ष्य ऐसा हो कि बाद में उसे बार बार बदलना न पड़े बार बार लक्ष्य बदलने पर आपको बड़ी हानि उठानी पड़ेगी क्योंकि जीवन के कुछ पल बहुत ही

कीमती होते हैं l उन पलों को गावों कर पुन दूसरे लक्ष्य पर जाने से आपको वह उपलब्धि नहीं मिल पाएगी जो यथार्थ में वांछित होता है l

इसीलिए लक्ष्य निर्धारित करते समय बहुत बारीकी से और कई कई बार या सैकड़ों बार विवेकपूर्ण ढंग से सोच लें तभी किसी कार्य को अपना लक्ष्य बनाएं l

एक समय में किसी एक उपलब्धि के बारे में ही सोचे वा उसे अपना लक्ष्य बनाएं l

एक समय में किसी एक उपलब्धि के बारे में ही सोचे वा उसे अपना लक्ष्य बनाएं और उसे प्राप्त करने के लिए साधना रूपी सफर पर निकल पड़े

लक्ष्य निर्धारित करने के बाद फिर से पीछे देखना या मतिभ्रम की स्थिति में आना अच्छी बात नहीं है l अंत जो लक्ष्य आप निश्चित कर लें उस पर अडिग

होकर कार्य करें तभी सफलता संभव हो पायेगी l कुल मिला कर कोई भी कार्य करने से पहले बार बार सोचिए फिर कार्य पथ पर चल पड़ने के बाद

पीछे मुड़ कर बिल्कुल मत देखिए जब तक कि आपका लक्ष्य प्राप्त न हो जाए यही लक्ष्य प्राप्त करने की सबसे बड़ी कसौटी है l

दिघर्यु इच्छा शक्ति और आत्मबल

किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अदम्य इच्छा शक्ति की भी बहुत बड़ी आवश्यकता है l इसका शाब्दिक तात्पर्य ऐसी इच्छा शक्ति से जिसका दमन

ना किया जा सके यह एक ऐसा शब्द है जो आपकी इच्छा की प्रबलता को दर्शाता है l अपार्स है l आपमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कितनी

प्रबल इच्छा है l अगर आपमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की ईमानदारी से सौ प्रतिशत इच्छा है, तो समझिए आप भाग्य शाली है l

ऐसी इच्छा के अन्दर एक शक्ति छिपी हुई रहती है, आई ए एस का मतलब जब किसी वस्तु या लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आपमें तीव्र इच्छा होती है,

तो निश्चित रूप से आप उनको पाने के लिए बेताब हो उठते हैं, उसके लिए अपना जी जान लगा देते हैं l अगर आपकी इच्छा ही आधी अधूरी है l

तो आप पूरे मनोयोग से प्रयास नहीं कर पाते और सफलता भी आप से दूर भागती रहती है l अंत उत्कृष्ट सफलता के लिए इच्छा शक्ति को सतत

प्रबलता प्रदान करते रहने की अत्यन्त आवश्यकता है l यह भी एक विशेष गुण है, जो विरले लोगों में पाया जाता है l बहुत से लोग कार्य के प्रारंभ में

तो लक्ष्य के प्रति आति उतावले दिखाईं पड़ते हैं, जैसे वे चांद पर छलांग लगा देंगे परन्तु जैसे जैसे समय गुजरता जाता है, वैसे वैसे उनकी इच्छा शक्ति

धीमी पड़ती जाती है l और सच मानिए ऐसे लोगों की इच्छा शक्ति और प्रयास दोनों बीच सफर में ही दम तोड देते हैं, और ऐसे लोग सफलता की मंजिल तक नहीं पहुंच पाते l

उदाहरण के लिए सिविल सेवा प्रतियोगिता परिक्षाओं में भाग लेने वाले कई प्रतियोगी प्रारंभ में तैयारी के प्रति अति उतावले दिखाईं पड़ते हैं ,

ऐसे गर्व के साथ आचरण दिखाते हैं जैसे उनका कलेक्टर या एसपी के लिए चयन हो गया हो परन्तु जब उन्हें दो तीन साल तक सफलता नहीं मिल पाती

तो उनका साहस जवाब देने लगता है l उनकी इच्छा शक्ति डगमगाने लगती है l और धीरे धीरे वे तैयारी में लापरवाही बरतने लगते हैं l

मेहनत कम कर देते हैं, फिर एक समय ऐसा आता है, जब वे तैयारी करना पूर्ण तया छोड़ देते हैं l उनकी मानसिकता बन जाती है कि सिविल सेवाओं

में उन्हें सफलता मिलना बेहद दुष्कर है l जबकि यहां जरूरत होती है कि वे निरन्तर मिलने वाली असफलताओं से घबराएं नहीं और निरन्तर अपनी कमियों का विश्लेषण करते हुए उन्हें दूर करें और तैयारी को जारी रखें l

जब वे परीक्ष की तैयारी छोड़ने का मन बनाने लगते हैं, उस समय वे पजातीव रुप यह नहीं समझ पाते कि अब तक उनकी तैयारी कम से

कम 80/या 85/प्रतिशत तक हो चुकी होती है l अभी अपनी इच्छा शक्ति को निरन्तर बलवती बनाए रखते हुए दो तीन साल तक निरन्तर अपनी

तैयारी उचित तरीके के साथ जारी रखनी चाहिए इसी समय उन्हें ऐसे कठीन बिंदुओं का अध्ययन करना चाहिए जिनकी बारीकियों से वे अभी तक अछूते

रह गए हैं, साथ ही इस विश्लेषण में अपने प्रयासी अनुशासन और तकनीकिपूर्ण परिश्रम को भी शामिल करना चाहिए कुल मिला कर उन्हें

अपनी इच्छा शक्ति को तब तक अदम्य बनाए रखने की आवश्यकता है जब तक कि सफलता मिल न जाए इसी को अदम्य इच्छा शक्ति कहते हैं l

इसे एक उदाहरण द्वारा आप अच्छी तरह से समझ सकते हैं l प्राचीन काल में एक महान जिज्ञासु छात्र एकलव्य भील राज हिरण्य धनु का पुत्र था l

उसके मन में धनुविर्धा सीखने की बड़ी तीव्र इच्छा थी l वह अपने पिता के साथ अर्जुनादि राजकुमारों को जंगल में स्थित अपने आश्रम में धनुष विद्या

सिखा रहे गुरु द्रोणाचार्य के पास पहुंचा और उन्हें प्रणाम कर धनुर्विद्या सीखने की इच्छा जाहिर की परन्तु गुरु द्रोणाचार्य ने उसे धनुविधा

आई ए एस क्या है

सीखने से मना कर दिया आप समझ आई. ए. एस. अधिकारी सकते हैं कि एकलव्य कितनी आशा और उत्साह से उनके पास गया रहा होगा l

यदि इस समय गुरु द्रोणाचार्य के द्वारा उसे धनुविर्ध सिखाने से मना किया गया तो निश्चित रूप से उसे बड़ी निराशा हुई होगी परन्तु उसने अपना धैर्य

नहीं खोया क्योंकि उसमें धनुविर्धा सीखने की बड़ी तीव्र इच्छा थी l यहां पर उसकी इच्छा शक्ति कार्य करने लगीं और एकलव्य को निराश नहीं होने दिया

वह निरन्तर अपने लक्ष्य के लिए मार्ग तलाशता रहा और अन्त तीव्र इच्छा शक्ति के कारण उसे अपने लक्ष्य का रास्ता मिल गया l

उसने अपने मन में एक युक्ति ढूंढ निकाली वह अपने पिता हिरण्य धनु से बोला पिताजी आप चिन्ता मत किजिए मुझे अपने लक्ष्य का मार्ग मिल गया है l सुबह एकलव्य एकलव्य एकान्त जंगल में जाकर गुरु द्रोणाचार्य के

आश्रम से कुछ ही दूरी पर अपना स्वयं का एक आश्रम बनाया उसमें गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति स्थापित की और उनके सामने पूरे लगन के

साथ धनुविर्घा का अभ्यास करने लगा आश्चर्य की बात यह हुई कि कुछ ही दिनों में वह एक बड़ा धनुर्धर बन गया l इस बात का प्रमाण हमें इस घटना

से मिलता है, कि एक दिन गुरु द्रोणाचार्य राजकुमारों के साथ जंगल की सैर करते हुए एकलव्य के आश्रम की ओर एकलव्य से बिना अवगत हुए जा रहे

थे l उनका कुत्ता भी इनके साथ उनसे लगभग दो सौ मीटर आगे आगे चला जा रहा था l जंगल घनघोर था l आगे आगे चलने के कारण कुत्ता पहले ही

एकलव्य के आश्रम के समीप जा पहुंचा और अपने अभ्यास में लीन काले वर्ण वाले एकलव्य को देख कर भू भू कर भूंकने लगा इससे एकलव्य की

साधना में विध्न पैदा हुई एकलव्य ने सोचा इस कुत्ता का मुख बंद कर दिया जाए पल भर में उसने कुत्ते के मुख में सात वन मार दिए और उनका मुख

बंद कर दिया जाए पल भर में उसने कुत्ते के मुख में सात वन मार दिए और उनका मुख बंद कर दिया l परन्तु एकलव्य के द्वारा वन इतनी संयम वा

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दोस्तो पोस्ट पढ़ने के बाद कॉमेंट में ज़रूर करें पोस्ट पढ़ने में कैसा लगा धन्यवाद आपका

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